भारत से ठंडे इलाकों की ओर लौटने वाले प्रवासी पक्षी और उनके जीवन का कठिन संघर्ष

भारत से ठंडे इलाकों की ओर लौटने वाले प्रवासी पक्षी और उनके जीवन का कठिन संघर्ष

भारत के आसमान में गूंजने वाली उनकी चहचहाहट अब धीरे-धीरे कम हो रही है। अगर आपने हाल ही में किसी झील या वेटलैंड के पास से गुजरते समय सन्नाटा महसूस किया है, तो समझ लीजिए कि मेहमानों की रवानगी का समय आ गया। भारत से साइबेरिया, मंगोलिया और सेंट्रल एशिया के ठंडे इलाकों में लौटने वाले पक्षी अब अपने हजारों मील लंबे सफर पर निकल चुके हैं। यह महज एक यात्रा नहीं है। यह मौत और जिंदगी के बीच का वो बारीक धागा है जिसे ये नन्हे जीव हर साल पार करते हैं।

जब उत्तर भारत में पारा 40 डिग्री सेल्सियस छूने लगता है, तो इन विदेशी मेहमानों के लिए यहां रुकना नामुमकिन हो जाता है। लोग अक्सर सोचते हैं कि ये पक्षी ठंड से बचने के लिए भारत आते हैं। सच तो ये है कि वे केवल ठंड से नहीं, बल्कि खाने की कमी से बचने आते हैं। अब जब उनके मूल घरों यानी साइबेरिया और आर्कटिक क्षेत्रों में बर्फ पिघलनी शुरू हो गई है, तो वहां भोजन की प्रचुरता होगी और प्रजनन के लिए सही माहौल मिलेगा। इसीलिए, वे बिना रुके उड़ान भरने को तैयार हैं। Discover more on a connected subject: this related article.

सेंट्रल एशियन फ्लाईवे का खतरनाक रास्ता

भारत से लौटने वाले ज्यादातर पक्षी सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (CAF) का इस्तेमाल करते हैं। यह दुनिया के उन 9 प्रमुख रास्तों में से एक है जिसका उपयोग प्रवासी पक्षी करते हैं। यह रास्ता आर्कटिक से लेकर हिंद महासागर तक फैला है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस सफर में पक्षियों को हिमालय जैसी विशाल चोटियों को पार करना पड़ता है।

कल्पना कीजिए कि एक पक्षी जिसका वजन महज 300-400 ग्राम है, वह 20,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा है जहां ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम है। बार-हेडेड गूज (Bar-headed Goose) जैसे पक्षी माउंट एवरेस्ट के ऊपर से भी उड़ान भरने की ताकत रखते हैं। वे अपनी मांसपेशियों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं कि कम ऑक्सीजन में भी उनका दिल तेजी से धड़कता रहे। यह कुदरत का करिश्मा ही है कि बिना किसी जीपीएस के ये पक्षी हर साल उसी पुराने पेड़ या तालाब पर लौटते हैं जहां वे पिछली बार रुके थे। Additional journalism by The Washington Post highlights comparable perspectives on the subject.

इन मेहमानों की लिस्ट बहुत लंबी है

जब हम प्रवासी पक्षियों की बात करते हैं, तो दिमाग में बस कुछ ही नाम आते हैं। हकीकत में भारत में हर साल लगभग 370 से ज्यादा प्रजातियां बाहर से आती हैं। इनमें से प्रमुख नाम कुछ इस प्रकार हैं।

  • साइबेरियन क्रेन: ये कभी भारत की शान हुआ करते थे, लेकिन अब इनकी संख्या बेहद कम हो गई है।
  • नदर्न पिनटेल: लंबी गर्दन और पतली पूंछ वाले ये पक्षी रूस और यूरोप से आते हैं।
  • अमूर फाल्कन: ये शिकारी पक्षी नागालैंड में एक पड़ाव डालते हैं और फिर दक्षिण अफ्रीका की ओर निकल जाते हैं।
  • ग्रेटर फ्लेमिंगो: हालांकि ये भारत के कुछ हिस्सों में साल भर दिखते हैं, लेकिन एक बड़ी आबादी ईरान और मध्य पूर्व से आती है।
  • रैडी शेल्डक (सुरखाब): इन्हें आप लद्दाख और हिमालयी क्षेत्रों के आसपास देख सकते हैं, जो तिब्बत और मंगोलिया से आते हैं।

ये पक्षी भारत के वेटलैंड्स जैसे केवलादेव नेशनल पार्क (भरतपुर), चिल्का झील (ओडिशा) और नजफगढ़ झील (दिल्ली-एनसीआर) को अपना घर बनाते हैं। अब इन जगहों पर सन्नाटा पसरने लगा है क्योंकि इनके झुंड उत्तर की ओर रुख कर चुके हैं।

क्लाइमेट चेंज ने कैसे बिगाड़ा पूरा खेल

ईमानदारी से कहूं तो हम इंसानों ने इन पक्षियों का रास्ता और मुश्किल बना दिया है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से साइबेरिया में बर्फ समय से पहले पिघल रही है। इससे पक्षियों के 'माइग्रेशन टाइमिंग' और वहां भोजन की उपलब्धता के बीच का तालमेल बिगड़ गया है। अगर वे भारत से जल्दी निकल जाएं तो रास्ते में उन्हें भीषण गर्मी मिलती है, और अगर देर करें तो वहां प्रजनन का समय निकल जाता है।

प्रदूषण और घटते वेटलैंड्स एक और बड़ी समस्या हैं। भारत में कई झीलें अब कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुकी हैं। जब पक्षी थक-हारकर उतरने के लिए जगह ढूंढते हैं, तो उन्हें साफ पानी के बजाय गंदे नाले और ऊंची इमारतें मिलती हैं। बिजली की लाइनें और शिकारी भी उनके सफर के बड़े दुश्मन हैं। हर साल लाखों पक्षी अपने गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। यह सिर्फ उन पक्षियों का नुकसान नहीं है, बल्कि हमारे इकोसिस्टम का भी विनाश है क्योंकि ये पक्षी कीट नियंत्रण और परागण (pollination) में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

वे वापस कब आएंगे और हमें क्या करना चाहिए

इन पक्षियों की वापसी का सिलसिला अब शुरू हुआ है जो मई के अंत तक चलेगा। इसके बाद वे अपने मूल देशों में अंडा देंगे और अपने बच्चों को पालेंगे। फिर जैसे ही वहां अक्टूबर-नवंबर में बर्फबारी शुरू होगी, वे फिर से भारत का रुख करेंगे। लेकिन क्या हम उन्हें वैसा ही भारत दे पाएंगे जैसा वे चाहते हैं?

हमें समझना होगा कि ये पक्षी हमारे पर्यावरण के स्वास्थ्य के संकेतक हैं। अगर वे आ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हमारे जल स्रोत जीवित हैं। अगर वे आना बंद कर दें, तो समझ लीजिए कि खतरा बहुत करीब है। एक आम नागरिक के तौर पर आप अपने आसपास के छोटे तालाबों को बचाने की कोशिश कर सकते हैं। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना और पक्षियों के प्राकृतिक आवास में दखल न देना सबसे बड़ा योगदान होगा।

अगली बार जब आप आसमान में 'V' आकार में उड़ते पक्षियों के झुंड को देखें, तो उन्हें बस विदा मत कीजिए। यह याद रखिए कि वे अपनी जान जोखिम में डालकर हजारों मील दूर से सिर्फ जीवित रहने के लिए आए थे। उनकी इस लंबी यात्रा का सम्मान करना और उनके ठिकानों को सुरक्षित रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। अपने आसपास के वेटलैंड्स के बारे में जागरूक बनें और दूसरों को भी बताएं कि ये बेजुबान पक्षी हमारे जीवन के लिए कितने जरूरी हैं।

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Lucas Evans

A trusted voice in digital journalism, Lucas Evans blends analytical rigor with an engaging narrative style to bring important stories to life.