अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने डोनाल्ड ट्रम्प की आव्रजन नीति पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। मुख्यधारा का मीडिया इसे ट्रम्प की बहुत बड़ी जीत बता रहा है। लेकिन यह जीत उतनी सीधी नहीं है जितनी दिखती है। इसके पीछे कानूनी पेंच और दूरगामी राजनीतिक परिणाम छिपे हैं। अगर आप सोच रहे हैं कि इस फैसले से अमेरिका की सीमाएं रातों-रात पूरी तरह सील हो जाएंगी, तो आप गलत हैं।
इस कानूनी लड़ाई की जड़ें बहुत गहरी हैं। ट्रम्प प्रशासन लंबे समय से शरणार्थियों (असाइलम सीकर्स) के लिए कड़े नियम लागू करने की कोशिश कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार उस विवादित शरणार्थी कानून को अपनी मंजूरी दे दी है जो तीसरे देश से होकर आने वाले प्रवासियों को अमेरिका में शरण मांगने से रोकता है। इसका मतलब साफ है। मेक्सिको के रास्ते अमेरिकी सीमा पर पहुंचने वाले मध्य अमेरिकी देशों के प्रवासियों को अब अमेरिका में एंट्री नहीं मिलेगी, बशर्ते उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले किसी अन्य देश में शरण के लिए आवेदन न किया हो।
यह फैसला अमेरिकी आव्रजन प्रणाली को पूरी तरह बदल कर रख देगा। आइए समझते हैं कि इस फैसले के असल मायने क्या हैं और क्यों इसे लेकर इतना बड़ा बवाल मचा हुआ है।
ट्रम्प के शरणार्थी कानून का पूरा गणित
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश मूल रूप से एक अंतरिम व्यवस्था है। इसने निचली अदालतों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को हटा दिया है। अदालत के इस रुख से ट्रम्प प्रशासन को अपनी सबसे सख्त सीमा नीतियों में से एक को लागू करने की खुली छूट मिल गई है।
इस कानून को समझिए। यदि कोई व्यक्ति अल साल्वाडोर, होंडुरास या ग्वाटेमाला से भागकर अमेरिका आना चाहता है, तो उसे पहले मेक्सिको या किसी अन्य देश में शरण मांगनी होगी। अगर वह ऐसा किए बिना सीधे अमेरिकी सीमा पर आता है, तो उसे तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
यह कोई छोटा बदलाव नहीं है। यह असल में अमेरिकी शरणार्थी कानून की मूल भावना पर एक बड़ा प्रहार है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका की नीति रही है कि जो भी व्यक्ति उत्पीड़न से बचकर उसकी सीमा पर पहुंचेगा, उसे अपनी बात रखने का मौका मिलेगा। अब वह व्यवस्था खत्म हो चुकी है।
नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट में रूढ़िवादी जजों की संख्या अधिक है। इसका असर साफ दिखा। अदालत ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। केवल दो उदारवादी जजों, सोनिया सोटोमायोर और रूथ बेडर गिन्सबर्ग ने इसके खिलाफ असहमति जताई। जस्टिस सोटोमायोर ने अपने कड़े नोट में लिखा कि यह फैसला सबसे कमजोर लोगों की सुरक्षा करने वाली स्थापित व्यवस्था को नष्ट करता है।
क्या यह वाकई डोनाल्ड ट्रम्प की बड़ी जीत है
राजनीतिक रूप से यह निश्चित रूप से ट्रम्प के लिए एक बहुत बड़ा बूस्ट है। वे हमेशा से अपने समर्थकों से सीमा पर सख्ती का वादा करते रहे हैं। चुनाव के लिहाज से यह मुद्दा उनके लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जैसा है।
लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसके लागू होने में कई बड़ी चुनौतियां हैं।
- मेक्सिको की लाचारी: मेक्सिको की अपनी सीमाएं और संसाधन सीमित हैं। लाखों प्रवासियों का बोझ उठाना उसके लिए असंभव है। वहां की कानून व्यवस्था पहले से ही ड्रग कार्टेल्स के कारण चरमराई हुई है।
- मानवीय संकट का खतरा: मेक्सिको के सीमावर्ती शहरों में पहले से ही भारी भीड़ है। इस फैसले के बाद वहां गंदगी, भुखमरी और अपराध बढ़ने का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
- कानूनी लड़ाइयों का अगला दौर: सुप्रीम कोर्ट ने अभी केवल नीति को लागू करने की अनुमति दी है। इस पर मुख्य कानूनी लड़ाई अभी भी निचली अदालतों में चल रही है। इसका मतलब है कि यह फैसला अंतिम नहीं है।
मानवाधिकार संगठन जैसे अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) इसके खिलाफ मजबूती से खड़े हैं। उनका तर्क है कि यह नीति अमेरिकी और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही कानूनों का उल्लंघन करती है। अमेरिकी कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी तरीके से अमेरिका पहुंचे, वह शरण के लिए आवेदन कर सकता है।
इस फैसले का भारत और अन्य देशों पर क्या असर होगा
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि इस कानून से सिर्फ लैटिन अमेरिकी देशों के लोग प्रभावित होंगे। यह आपकी सबसे बड़ी भूल है।
पिछले कुछ सालों में मेक्सिको के रास्ते अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले भारतीय प्रवासियों की संख्या में भारी उछाल आया है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से हजारों युवा लाखों रुपये खर्च करके 'डंकी रूट' के जरिए अमेरिका पहुंचने की कोशिश करते हैं।
अब इस नए कानून के बाद उन भारतीय प्रवासियों के लिए रास्ते बंद हो जाएंगे। अगर वे मेक्सिको के रास्ते अमेरिकी सीमा पर पकड़े जाते हैं, तो उन्हें बिना किसी सुनवाई के वापस भेज दिया जाएगा क्योंकि उन्होंने मेक्सिको में शरण नहीं मांगी थी।
यह फैसला उन सभी अंतरराष्ट्रीय यात्रियों पर लागू होता है जो तीसरे देश के रास्ते अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। मानव तस्करों (डोन्कर) का पूरा बिजनेस मॉडल अब इस एक फैसले से ध्वस्त होने की कगार पर है।
आने वाले दिनों में क्या उम्मीद करें
यह कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। आपको इस पर नजर रखनी चाहिए कि निचली अदालतें अब इस पर अंतिम फैसला क्या सुनाती हैं। लेकिन तब तक के लिए ट्रम्प प्रशासन को सीमा पर मनमानी करने का पूरा अधिकार मिल गया है।
अगर आप अमेरिकी राजनीति और आव्रजन नीतियों पर नजर रखते हैं, तो आने वाले दिनों में सीमा पर तनाव बढ़ने की उम्मीद कीजिए। प्रवासियों के कैंपों में अशांति फैल सकती है। अमेरिकी प्रशासन अपनी कार्रवाई तेज करेगा।
आप इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक राजनीतिक जीत के रूप में नहीं देख सकते। यह वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों और शरणार्थियों के अधिकारों की परिभाषा बदलने वाला क्षण है। इस पर हो रहे हर नए कानूनी बदलाव को बारीकी से ट्रैक करते रहें क्योंकि इसके छींटे पूरी दुनिया पर पड़ने वाले हैं।